मिड-डे मील के दौरान बच्चों के बीच घूमता आवारा कुत्ता: लाहौद के स्वामी आत्मानंद स्कूल का वीडियो वायरल, आदेशों के बावजूद जमीन पर लापरवाही?

मिड-डे मील के दौरान बच्चों के बीच घूमता आवारा कुत्ता: लाहौद के स्वामी आत्मानंद स्कूल का वीडियो वायरल, आदेशों के बावजूद जमीन पर लापरवाही?

बलौदा बाजार।बलौदाबाजार जिले के सरकारी स्कूल एक बार फिर सवालों के घेरे में हैं। कुछ दिन पहले पलारी विकासखंड के लच्छनपुर स्कूल में बच्चों को कथित तौर पर कुत्तों का जूठा भोजन परोसे जाने का मामला सामने आया था। उस घटना की गूंज अभी थमी भी नहीं थी कि अब बलौदा बाजार विकासखंड के स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट विद्यालय, लाहौद का एक नया वीडियो सामने आ गया है। वीडियो में मध्यान्ह भोजन कर रहे बच्चों के बीच एक आवारा कुत्ता खुलेआम घूमता दिखाई दे रहा है। यह दृश्य सिर्फ एक लापरवाही नहीं, बल्कि उन निर्देशों की अनदेखी भी है जो सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के आदेशों के बाद लोक शिक्षण संचालनालय द्वारा जारी किए गए थे। सवाल अब सीधे तौर पर जिम्मेदारों पर है—आखिर आदेश जारी होने के बाद भी स्कूल परिसर में कुत्तों की आवाजाही क्यों नहीं रुकी?

क्या दिख रहा है वायरल वीडियो में?

अभिभावकों द्वारा बनाए गए इस वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि स्कूल परिसर में बच्चे पंक्तिबद्ध बैठकर मध्यान्ह भोजन कर रहे हैं। कुछ बच्चे खेलते हुए नजर आ रहे हैं। इसी दौरान एक आवारा कुत्ता बच्चों के बेहद करीब घूमता दिखाई देता है।
कुत्ता बच्चों के बीच से गुजरता है, आसपास मंडराता है और किसी भी स्तर पर उसे रोकने या बाहर निकालने की कोई तत्परता नजर नहीं आती। वीडियो में यह भी स्पष्ट है कि स्कूल परिसर खुला है और पशुओं के प्रवेश को रोकने के लिए कोई ठोस व्यवस्था दिखाई नहीं दे रही।
मध्यान्ह भोजन के दौरान इस तरह की स्थिति न केवल स्वच्छता के लिहाज से गंभीर है, बल्कि बच्चों की सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा है। आवारा कुत्तों द्वारा काटने या भोजन को दूषित करने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

आदेश क्या कहते हैं?

लोक शिक्षण संचालनालय छत्तीसगढ़ द्वारा पत्र क्रमांक 709 के माध्यम से स्पष्ट निर्देश जारी किए गए थे कि प्रत्येक स्कूल में एक प्रभारी नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाए। उसकी जिम्मेदारी होगी कि स्कूल परिसर के अंदर और बाहर कुत्तों की आवाजाही पर निगरानी रखी जाए और आवश्यक कदम उठाए जाएं।
इन निर्देशों की पृष्ठभूमि में न्यायालयों के आदेश भी हैं, जिनमें स्कूल परिसरों में बच्चों की सुरक्षा और स्वच्छता को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की बात कही गई है। स्पष्ट कहा गया है कि स्कूल परिसर में आवारा पशुओं का प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित होना चाहिए। लेकिन लाहौद के इस स्कूल का वीडियो यह सवाल खड़ा कर रहा है कि क्या ये आदेश सिर्फ कागजों तक सीमित हैं?

पहले भी हो चुका है विवाद

जिले में हाल ही में लच्छनपुर स्कूल का मामला सामने आया था, जहां बच्चों को कथित तौर पर कुत्तों का जूठा भोजन परोसे जाने की बात सामने आई थी। उस घटना ने पूरे जिले में आक्रोश पैदा किया था और शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठे थे। उसके बाद जिला शिक्षा अधिकारी और अन्य अधिकारियों ने सख्त निर्देश जारी किए थे। सभी स्कूलों को चेतावनी दी गई थी कि परिसर की स्वच्छता और सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। लेकिन लाहौद का ताजा मामला बताता है कि जमीनी स्तर पर हालात अब भी संतोषजनक नहीं हैं।

प्राचार्य का क्या कहना है?

इस मामले में स्कूल के प्राचार्य केशव प्रसाद साहू का कहना है कि स्कूल में एक शिक्षक को नोडल अधिकारी नियुक्त किया गया है। उनके अनुसार, निर्देशों का पालन किया जा रहा है और स्कूल प्रबंधन बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर है। हालांकि वीडियो में जो दृश्य सामने आया है, वह इन दावों से मेल नहीं खाता। यदि नोडल अधिकारी नियुक्त है, तो फिर मध्यान्ह भोजन के दौरान कुत्ता परिसर में कैसे पहुंच गया? क्या निगरानी में चूक हुई? या फिर आदेशों का पालन केवल औपचारिकता बनकर रह गया?

जिला शिक्षा अधिकारी की प्रतिक्रिया

जिला शिक्षा अधिकारी डॉ संजय गुहे ने कहा कि पहले भी इस तरह की घटना सामने आ चुकी है और सभी स्कूलों को स्पष्ट निर्देश दिए गए थे। उन्होंने माना कि यदि लाहौद स्कूल में लापरवाही पाई जाती है तो कार्रवाई की जाएगी और निर्देश दोबारा जारी किए जाएंगे। उनका यह बयान कई सवाल खड़े करता है। यदि पहले ही निर्देश जारी हो चुके थे और घटना दोबारा सामने आ रही है, तो क्या निगरानी व्यवस्था कमजोर है? क्या ब्लॉक शिक्षा अधिकारी और अन्य अधिकारियों द्वारा नियमित निरीक्षण नहीं किया जा रहा?

अभिभावकों में नाराजगी

वीडियो सामने आने के बाद अभिभावकों में नाराजगी है। कई अभिभावकों का कहना है कि वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में इसलिए भेजते हैं ताकि उन्हें बेहतर शिक्षा और सुरक्षित वातावरण मिल सके। लेकिन इस तरह की घटनाएं भरोसा तोड़ने का काम करती हैं। कुछ अभिभावकों ने कहा कि मध्यान्ह भोजन योजना बच्चों के पोषण के लिए है, लेकिन यदि भोजन के दौरान ही स्वच्छता और सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो पा रही, तो यह गंभीर चिंता का विषय है।

बच्चों की सुरक्षा से खिलवाड़?

आवारा कुत्तों की समस्या केवल स्वच्छता तक सीमित नहीं है। कई बार कुत्तों के हमले की घटनाएं भी सामने आती रही हैं। छोटे बच्चों के बीच यदि कुत्ता आक्रामक हो जाए, तो बड़ी दुर्घटना हो सकती है। मध्यान्ह भोजन के दौरान बच्चे जमीन पर बैठकर खाना खाते हैं। ऐसे में किसी भी जानवर का वहां पहुंचना स्वास्थ्य और सुरक्षा दोनों के लिहाज से जोखिम भरा है। सवाल यह है कि क्या स्कूल परिसर में पर्याप्त बाउंड्री, गेट और निगरानी व्यवस्था है?

निगरानी तंत्र पर बड़ा सवाल!

डीपी से लेकर जिला शिक्षा अधिकारी और ब्लॉक शिक्षा अधिकारी तक कई स्तरों पर आदेश जारी हो चुके हैं। लेकिन क्या इन आदेशों की मॉनिटरिंग हो रही है? क्या किसी स्तर पर यह जांच की जाती है कि नोडल अधिकारी वास्तव में अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं या नहीं? क्या नियमित निरीक्षण रिपोर्ट तैयार होती है? यदि होती है, तो इस तरह की घटना कैसे सामने आ रही है?

जिम्मेदारी तय होगी या फिर औपचारिक कार्रवाई?

ऐसे मामलों में अक्सर जांच के आदेश और नोटिस जारी होते हैं, लेकिन कुछ दिनों बाद मामला ठंडा पड़ जाता है। अभिभावकों का कहना है कि यदि इस बार भी केवल चेतावनी देकर मामला खत्म कर दिया गया, तो भविष्य में भी ऐसी घटनाएं दोहराई जा सकती हैं। जरूरी है कि जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से तय की जाए। यदि नोडल अधिकारी नियुक्त है, तो उसकी भूमिका की समीक्षा हो। यदि प्राचार्य स्तर पर निगरानी में कमी है, तो उस पर भी सवाल उठें। यदि ब्लॉक स्तर पर निरीक्षण में ढिलाई है, तो वहां भी जवाबदेही तय हो।

क्या करेंगे जिला प्रशासन?

अब सबकी नजर जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग की अगली कार्रवाई पर है। क्या इस मामले में जांच टीम गठित होगी? क्या संबंधित स्कूल से जवाब तलब किया जाएगा? क्या निलंबन या अन्य दंडात्मक कार्रवाई होगी? यह केवल एक स्कूल का मामला नहीं, बल्कि पूरे जिले की शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा प्रश्न है। यदि आदेशों का पालन सख्ती से नहीं होगा, तो भविष्य में और भी गंभीर घटनाएं सामने आ सकती हैं।

लाहौद के स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट विद्यालय का वायरल वीडियो एक चेतावनी है। यह दिखाता है कि कागजों पर जारी आदेश और जमीनी हकीकत में अंतर अब भी मौजूद है।

बच्चों की सुरक्षा, स्वच्छता और गरिमा से समझौता नहीं किया जा सकता। मध्यान्ह भोजन योजना का उद्देश्य बच्चों को पोषण देना है, न कि उन्हें जोखिम में डालना। अब यह शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वे केवल निर्देश जारी करने तक सीमित न रहें, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन को भी सुनिश्चित करें।

सवाल साफ है—आखिर इन आदेशों की निगरानी कौन कर रहा है? और बच्चों की सुरक्षा को लेकर जिम्मेदार कब पूरी तरह जागेंगे? फिलहाल वीडियो ने शिक्षा विभाग को कटघरे में खड़ा कर दिया है। अब कार्रवाई से ही तय होगा कि व्यवस्था सच में सुधरेगी या फिर यह मामला भी फाइलों में सिमट कर रह जाएगा।

चंद्रकांत वर्मा, संपादक – ChhattisgarhTalk.com
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