बिना डायवर्सन बस गई पूरी कॉलोनी! 751 मकान, स्कूल और सैकड़ों परिवार रह रहे, अब T&CP के नोटिस से मचा हड़कंप

बिना डायवर्सन बस गई पूरी कॉलोनी! 751 मकान, स्कूल और सैकड़ों परिवार रह रहे, अब T&CP के नोटिस से मचा हड़कंप
बिना डायवर्सन बस गई पूरी कॉलोनी! 751 मकान, स्कूल और सैकड़ों परिवार रह रहे, अब T&CP के नोटिस से मचा हड़कंप
बिना डायवर्सन बस गई पूरी कॉलोनी! 751 मकान, स्कूल और सैकड़ों परिवार रह रहे, अब T&CP के नोटिस से मचा हड़कंप
बलौदाबाजार में बड़ा खुलासा: पहले बना ली कॉलोनी, बाद में याद आए नियम? 751 मकान, स्कूल, मंदिर, क्लब हाउस और शॉपिंग कॉम्प्लेक्स तक बन गए, लेकिन जरूरी अनुमतियों पर उठे सवाल…टाउन एंड कंट्री प्लानिंग और राजस्व विभाग की नोटिस के बाद प्रशासनिक गलियारों में चर्चा तेज
751 मकानों की कॉलोनी, स्कूल, मंदिर, क्लब हाउस और सैकड़ों परिवारों का बसेरा… लेकिन सवाल ये कि क्या ये सब बिना जरूरी अनुमति के बना? बलौदाबाजार में एक बड़े सीमेंट संयंत्र की आवासीय कॉलोनी पर नियमों के उल्लंघन के आरोप लगे हैं। टाउन एंड कंट्री प्लानिंग और राजस्व विभाग के नोटिस के बाद अब मामला सुर्खियों में है। आखिर क्या है पूरा विवाद, देखिए हमारी ये खास रिपोर्ट।
बलौदाबाजार जिले में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने प्रशासनिक व्यवस्था, भूमि उपयोग नियमों और औद्योगिक संस्थानों की जवाबदेही को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि जिले के समीप स्थित एक बड़े सीमेंट संयंत्र ने वर्षों पहले कर्मचारियों के लिए विशाल आवासीय कॉलोनी, स्कूल और अन्य सुविधाओं का निर्माण तो करा लिया, लेकिन इसके लिए आवश्यक प्रशासनिक प्रक्रियाओं और अनुमतियों का पूर्ण पालन नहीं किया गया। मामला सामने आने के बाद राजस्व विभाग और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग (टीएनसी) द्वारा नोटिस जारी किए जाने की जानकारी सामने आई है। इसके बाद प्रशासनिक महकमे से लेकर राजनीतिक गलियारों तक चर्चा तेज हो गई है।
सवालों के घेरे में विशाल आवासीय कॉलोनी
जिला मुख्यालय बलौदाबाजार से लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थित सीमेंट संयंत्र परिसर और उससे जुड़ी आवासीय कॉलोनी वर्षों से संचालित हो रही है। यहां सैकड़ों कर्मचारी अपने परिवारों के साथ निवास कर रहे हैं। जानकारी के अनुसार कॉलोनी में आवासीय भवनों के अलावा स्कूल, मंदिर, क्लब हाउस, चिकित्सा सुविधाएं, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और अन्य आधारभूत सुविधाएं भी विकसित की गई हैं। अब आरोप यह है कि इतनी बड़ी परियोजना के निर्माण से पहले भूमि उपयोग परिवर्तन (डायवर्सन) और निर्माण अनुज्ञा जैसी अनिवार्य प्रक्रियाएं पूरी नहीं की गईं।
2017 की पर्यावरणीय स्वीकृति में था कॉलोनी का उल्लेख
दस्तावेजों के अनुसार 30 मार्च 2017 को भारत सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा सीमेंट संयंत्र की उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए पर्यावरणीय स्वीकृति प्रदान की गई थी। स्वीकृति दस्तावेज में कर्मचारियों के लिए आवासीय कॉलोनी विकसित करने का उल्लेख भी किया गया था। योजना के अनुसार लगभग 22 हेक्टेयर क्षेत्र में कॉलोनी विकसित की जानी थी, जिसमें 33 प्रतिशत क्षेत्र ग्रीन बेल्ट के रूप में विकसित होना था। दस्तावेजों में कुल 751 आवासीय इकाइयों के निर्माण का उल्लेख है। इसके अलावा स्कूल, मंदिर, स्वास्थ्य केंद्र, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, क्लब हाउस, पेयजल व्यवस्था और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट जैसी सुविधाएं भी प्रस्तावित थीं।
पर्यावरणीय स्वीकृति और निर्माण अनुमति में अंतर
जानकारों का कहना है कि पर्यावरणीय स्वीकृति किसी परियोजना को पर्यावरणीय दृष्टि से अनुमति प्रदान करती है, लेकिन इसके बाद भी भूमि उपयोग परिवर्तन, भवन निर्माण अनुमति, स्थानीय निकायों की स्वीकृति और अन्य नियामक प्रक्रियाएं अलग-अलग स्तर पर पूरी करनी होती हैं। यही वह बिंदु है जिस पर वर्तमान विवाद केंद्रित है।
आरोप: लेआउट पास कराया, लेकिन बाकी प्रक्रियाएं नहीं हुईं पूरी
प्राप्त जानकारी के अनुसार संबंधित परियोजना के लिए लेआउट स्वीकृत कराया गया था, लेकिन कॉलोनी निर्माण से पूर्व आवश्यक डायवर्सन और निर्माण अनुज्ञा नहीं ली गई। यदि जांच में यह तथ्य सही पाए जाते हैं तो यह मामला केवल तकनीकी त्रुटि नहीं बल्कि नियामकीय उल्लंघन की श्रेणी में माना जा सकता है। यही कारण है कि संबंधित विभागों ने इस विषय को गंभीरता से लिया है।
नोटिस जारी होने के बाद बढ़ी हलचल
जानकारी के अनुसार अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग द्वारा संयंत्र प्रबंधन को नोटिस जारी किया गया है। नोटिस में आवश्यक अनुमतियों और भूमि उपयोग से जुड़े दस्तावेजों की जानकारी मांगी गई है।b
 नोटिस जारी होने के बाद प्रशासनिक स्तर पर हलचल बढ़ गई है। मामले की जानकारी उच्च स्तर तक पहुंचने की भी चर्चा है। फ़िलहाल नोटिस नहीं है लेकिन नोटिस जारी किए जाने के बात बी एल बांध ने कही है समाचार में उल्लेखित है
करोड़ों के जुर्माने की संभावना
जानकारों का मानना है कि यदि निर्माण बिना आवश्यक अनुमति के किया गया पाया जाता है और बाद में नियमितीकरण की प्रक्रिया अपनाई जाती है तो नियमानुसार भारी अर्थदंड लगाया जा सकता है। कॉलोनी के आकार और निर्माण क्षेत्रफल को देखते हुए यह राशि करोड़ों रुपए तक पहुंच सकती है. हालांकि अंतिम निर्णय जांच और नियमितीकरण प्रक्रिया के बाद ही लिया जाएगा।
कर्मचारियों और रहवासियों के बीच भी चर्चा
कॉलोनी में रहने वाले कर्मचारियों और उनके परिवारों के बीच भी यह विषय चर्चा का केंद्र बना हुआ है। लोगों का कहना है कि वे वर्षों से यहां रह रहे हैं और उन्हें कभी यह जानकारी नहीं थी कि निर्माण संबंधी अनुमतियों को लेकर कोई विवाद है।bयदि भविष्य में कोई प्रशासनिक कार्रवाई होती है तो उसका असर यहां रहने वाले सैकड़ों परिवारों पर भी पड़ सकता है।
राजस्व मंत्री के जिले में मामला, इसलिए बढ़ी संवेदनशीलता
यह मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि यह प्रदेश के राजस्व मंत्री के गृह जिले और विधानसभा क्षेत्र से जुड़ा हुआ बताया जा रहा है। ऐसे में लोग यह जानना चाहते हैं कि शासन इस मामले में क्या रुख अपनाता है और संबंधित विभाग किस प्रकार की कार्रवाई करते हैं। स्थानीय स्तर पर भी लोगों की नजरें प्रशासनिक जांच पर टिकी हुई हैं।
टीएनसी अधिकारी ने क्या कहा?
मामले को लेकर नगर एवं ग्राम निवेश विभाग के अधिकारियों का कहना है कि संबंधित परियोजना के लिए केवल लेआउट स्वीकृत कराया गया था। उनके अनुसार निर्माण संबंधी अन्य प्रक्रियाएं पूर्ण नहीं की गई थीं, जिसके चलते नोटिस जारी किया गया है। अधिकारियों का कहना है कि यदि प्रबंधन नियमितीकरण के लिए आवेदन प्रस्तुत करता है तो नियमानुसार निर्माण का परीक्षण कर अर्थदंड निर्धारित किया जाएगा।
संयंत्र प्रबंधन ने क्या दिया जवाब?
मामले पर संयंत्र प्रबंधन की ओर से भी प्रतिक्रिया सामने आई है। संयंत्र के यूनिट हेड हुकुम चंद गुप्ता ने कहा कि पूर्व में किस प्रकार प्रक्रियाओं का पालन किया गया या नहीं किया गया, इसकी पूरी जानकारी उन्हें नहीं है। उन्होंने कहा कि प्रशासन के साथ चर्चा कर मामले का समाधान निकालने का प्रयास किया जाएगा। यह बयान इस बात का संकेत माना जा रहा है कि प्रबंधन भी अब मामले को गंभीरता से ले रहा है।
 सबसे बड़ा सवाल: नियम सबके लिए समान हैं या नहीं?
इस पूरे विवाद ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। यदि कोई सामान्य नागरिक या निजी डेवलपर बिना डायवर्सन और बिना निर्माण अनुमति के कॉलोनी विकसित करता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होती है। ऐसे में यदि किसी बड़े औद्योगिक संस्थान द्वारा नियमों का पालन नहीं किया गया तो क्या उसके लिए भी वही मानक लागू होंगे? यही सवाल अब स्थानीय लोगों, सामाजिक संगठनों और प्रशासनिक हलकों में उठ रहा है।
आगे क्या?
फिलहाल पूरे मामले की निगाहें प्रशासनिक जांच पर टिकी हैं। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो नियमितीकरण, अर्थदंड और अन्य कानूनी कार्रवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। वहीं यदि प्रबंधन आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत कर देता है तो मामला अलग दिशा भी ले सकता है। लेकिन एक बात तय है कि बलौदाबाजार में सामने आया यह मामला आने वाले दिनों में प्रशासन, उद्योग और नियामकीय व्यवस्था के संबंधों पर बड़ी बहस का विषय बनने वाला है। अब देखना यह होगा कि जांच के बाद शासन और प्रशासन इस हाई-प्रोफाइल मामले में क्या फैसला लेते हैं और नियमों के पालन को लेकर क्या संदेश देते हैं।
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