खेत बचाओ अभियान को मिल रहा किसानों का साथ, 122 पंचायतों में पहुंचे कृषि वैज्ञानिक, 4,835 किसान हुए लाभान्वित

खेत बचाओ अभियान को मिल रहा किसानों का साथ, 122 पंचायतों में पहुंचे कृषि वैज्ञानिक, 4,835 किसान हुए लाभान्वित
खेत बचाओ अभियान को मिल रहा किसानों का साथ, 122 पंचायतों में पहुंचे कृषि वैज्ञानिक, 4,835 किसान हुए लाभान्वित
खेत बचाओ अभियान को मिल रहा किसानों का साथ, 122 पंचायतों में पहुंचे कृषि वैज्ञानिक, 4,835 किसान हुए लाभान्वित,रासायनिक खेती से प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ रहा कदम, जून भर चलेंगे जागरूकता शिविर….किसानों को समझाया जा रहा मिट्टी बचाने का मंत्र, लागत घटाने और उत्पादन बढ़ाने के तरीके भी बताए जा रहे
बलौदा बाजार। खेतों की घटती उर्वरा शक्ति, बढ़ती खेती लागत और रासायनिक उर्वरकों पर बढ़ती निर्भरता के बीच बलौदाबाजार जिले में शुरू किया गया “खेत बचाओ अभियान” किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। खेती और पर्यावरण दोनों को बचाने के उद्देश्य से चलाए जा रहे इस विशेष अभियान में अब तक जिले की 122 ग्राम पंचायतों के 4,835 से अधिक किसान सीधे तौर पर लाभान्वित हो चुके हैं। एक जून से शुरू हुआ यह अभियान पूरे जून माह तक चलेगा। इसके तहत गांव-गांव पहुंचकर किसानों को प्राकृतिक खेती, संतुलित उर्वरक उपयोग, मिट्टी की सेहत और खेती की लागत कम करने जैसे विषयों पर जानकारी दी जा रही है।
खेत बचाने की चिंता से शुरू हुआ अभियान
देशभर में कृषि भूमि की गुणवत्ता बनाए रखने और किसानों को टिकाऊ खेती की ओर प्रेरित करने के उद्देश्य से 1 जून से 30 जून 2026 तक राष्ट्रव्यापी “खेत बचाओ अभियान” चलाया जा रहा है। जिले में इस अभियान का संचालन प्रशासन और कृषि विभाग के संयुक्त प्रयास से किया जा रहा है। कलेक्टर कुलदीप शर्मा के मार्गदर्शन में सभी विकासखंडों में प्रतिदिन कृषि चौपाल, किसान संगोष्ठी और जनजागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। अभियान का मुख्य उद्देश्य किसानों को यह समझाना है कि अत्यधिक रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है और लंबे समय में उत्पादन क्षमता भी घट सकती है।
432 शिविरों का लक्ष्य, 122 पंचायतों तक पहुंचा अभियान
जिले में कुल 432 शिविर आयोजित किए जाने हैं। इनमें कृषि वैज्ञानिक, कृषि विस्तार अधिकारी और अन्य विभागों के कर्मचारी किसानों से सीधे संवाद कर रहे हैं। अब तक 122 ग्राम पंचायतों में शिविर आयोजित किए जा चुके हैं, जहां 4,835 किसानों ने भाग लिया। अधिकारियों के अनुसार आगामी दिनों में यह संख्या और तेजी से बढ़ेगी। शिविरों में किसानों को खेती की नई तकनीकों, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और उर्वरकों के संतुलित उपयोग के बारे में विस्तार से जानकारी दी जा रही है।
मिट्टी की सेहत बचाने पर विशेष जोर
अभियान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू मृदा स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता है। विशेषज्ञ किसानों को बता रहे हैं कि लगातार यूरिया और रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित उपयोग से मिट्टी में आवश्यक पोषक तत्वों की कमी होने लगती है। इससे खेती की लागत बढ़ती है और उत्पादन पर भी असर पड़ता है। इसी वजह से किसानों को मृदा परीक्षण कराने और उसकी रिपोर्ट के अनुसार उर्वरकों का उपयोग करने की सलाह दी जा रही है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि किसान मिट्टी की वास्तविक जरूरत को समझकर उर्वरक डालें तो लागत भी कम होगी और उत्पादन भी बेहतर मिलेगा।
प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ाने की कोशिश
खेत बचाओ अभियान का एक बड़ा लक्ष्य किसानों को प्राकृतिक खेती की ओर प्रेरित करना भी है। गांवों में आयोजित बैठकों में किसानों को बताया जा रहा है कि गोबर खाद, जीवामृत, जैविक खाद और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग से खेती को अधिक टिकाऊ बनाया जा सकता है। अभियान के दौरान पंचायत प्रतिनिधियों और किसानों को कम से कम 25 प्रतिशत कृषि भूमि पर प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। उप संचालक दीपक कुमार नायक  का मानना है कि यदि गांव स्तर पर प्राकृतिक खेती का दायरा बढ़ता है तो इससे मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होगा और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होगी।
खेती की लागत घटाने पर भी फोकस
आज खेती की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बढ़ती लागत है। बीज, उर्वरक, कीटनाशक और मजदूरी की बढ़ती कीमतों के कारण किसानों की आय पर दबाव बढ़ रहा है। इसी को ध्यान में रखते हुए शिविरों में वैज्ञानिक खेती के ऐसे तरीके बताए जा रहे हैं, जिनसे उत्पादन प्रभावित किए बिना लागत कम की जा सके। उप संचालक दीपक कुमार नायक  किसानों को फसल प्रबंधन, उर्वरक प्रबंधन और जल संरक्षण के व्यावहारिक उपाय समझा रहे हैं।
यूरिया और डीएपी के विकल्पों की जानकारी
अभियान के दौरान किसानों को केवल पारंपरिक उर्वरकों तक सीमित नहीं रहने की सलाह दी जा रही है। विशेषज्ञ एनपीके, एसएसपी, जैव उर्वरक, नैनो उर्वरक, जैविक खाद और सूक्ष्म पोषक तत्वों के उपयोग के बारे में भी जानकारी दे रहे हैं। इसके अलावा हरी खाद और नील हरित काई जैसी प्राकृतिक तकनीकों को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया जा रहा है। कृषि विभाग उप संचालक दीपक कुमार नायक का मानना है कि यदि किसान संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाते हैं तो मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रह सकती है।
खान-पान में बदलाव का भी संदेश
अभियान केवल खेती तक सीमित नहीं है। इस दौरान नागरिकों को खाद्य तेल की खपत में 10 प्रतिशत तक कमी लाने के लिए भी प्रेरित किया जा रहा है। उप संचालक दीपक कुमार नायक  का कहना है कि स्वस्थ जीवनशैली और संतुलित खान-पान न केवल स्वास्थ्य के लिए बेहतर है बल्कि खाद्य संसाधनों के बेहतर उपयोग में भी मददगार साबित हो सकता है।
गांव-गांव पहुंच रहा जागरूकता अभियान
सोमवार को जिले के विभिन्न विकासखंडों की कई पंचायतों में शिविर आयोजित किए गए। विकासखंड पलारी के ओड़ान, ससहा, कुसमी और बलौदी में किसानों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। इसी प्रकार भाटापारा विकासखंड के बोड़तरा, गाड़ाडीह, सिंगारपुर, गोढ़ी और कोदवा में भी कार्यक्रम आयोजित हुए। बलौदाबाजार विकासखंड के बाजाराभाठा, खटियापाटी, डोंगरीडीह, खंदा और लवनबन में किसानों को प्रशिक्षण दिया गया। वहीं कसडोल विकासखंड के चरौदा, मोहतरा, पिसीद, सार्वा और मानाकोनी में कृषि चौपाल लगाकर किसानों को जानकारी प्रदान की गई।
खेती का भविष्य बचाने की पहल
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वर्तमान समय में मिट्टी के स्वास्थ्य और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया गया तो भविष्य में कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है। ऐसे में खेत बचाओ अभियान केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि खेती के भविष्य को सुरक्षित रखने की पहल बनकर उभर रहा है।
किसानों से सहयोग की अपील
कृषि विभाग उप संचालक दीपक कुमार नायक ने किसानों से अपील की है कि वे शिविरों में अधिक से अधिक संख्या में शामिल हों, कृषि वैज्ञानिकों की सलाह लें और अपनी खेती में वैज्ञानिक एवं प्राकृतिक तरीकों को अपनाने का प्रयास करें। जिले में चल रहा यह अभियान आने वाले दिनों में और अधिक गांवों तक पहुंचेगा। यदि किसानों की भागीदारी इसी तरह बनी रही तो यह पहल खेती को अधिक टिकाऊ, लाभकारी और पर्यावरण अनुकूल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
error: Content is protected !!