बलौदाबाजार पुलिस: एक की आत्मा को शांति, दूसरे की जान बची… और उन दो खाकी वर्दियों को मिला सम्मान

बलौदाबाजार पुलिस को सम्मानित करती तस्वीर —शांति, साहस और सच्चाई की जीत (Chhattisgarh Talk)
बलौदाबाजार पुलिस को सम्मानित करती तस्वीर —शांति, साहस और सच्चाई की जीत (Chhattisgarh Talk)

बलौदाबाजार पुलिस की उत्कृष्ट विवेचना से दो अलग-अलग मामलों में आरोपियों को सजा, न्याय की मिसाल बने निरीक्षक शशांक सिंह व एएसआई राजेश सेन…


चंदु वर्मा, बलौदाबाजार: कभी-कभी न्याय सिर्फ कागज़ों में दर्ज आदेश नहीं होता—वो आह होती है किसी माँ की जो अपने बच्चे के लिए इंसाफ मांग रही होती है… वो सुकून होता है किसी ज़ख्मी की आँखों में जो अब चैन से सांस ले पा रहा होता है। और ये सच्चाई बलौदाबाजार में एक नहीं, दो घटनाओं में सामने आई। फर्क सिर्फ इतना था—एक में मौत ने दस्तक दी, दूसरी में मौत आई तो सही, पर बचा लिया गया। और इन दोनों ही कहानियों के नायक बने बलौदाबाजार पुलिस के दो वर्दीधारी—निरीक्षक शशांक सिंह और सहायक उप निरीक्षक राजेश सेन, जिन्हें उनके उत्कृष्ट विवेचना कार्य के लिए आज सम्मानित किया गया।


बलौदाबाजार पुलिस प्रकरण 1: मंजू की खामोशी, जिसने चीख़ बनकर इंसाफ माँगा

वो सिर्फ 24 की थी… मंजू गायकवाड। सपनों से भरी आंखें और एक ऐसा जीवन जिसमें उसने सिर्फ प्यार मांगा था। लेकिन किस्मत ने उसे दर्द ही दिया—दहेज की माँग, रोज़ की ज़िल्लतें और पति की प्रताड़ना।

10 अक्टूबर 2023 की रात मंजू की साँसें थम गईं। अगले दिन सुबह उसका शरीर पंखे से लटका मिला। पहली नजर में यह आत्महत्या थी, लेकिन इंस्पेक्टर शशांक सिंह ने इसे बस ‘केस’ मानकर नहीं छोड़ा। उन्होंने मंजू की जिंदगी की परतें उधेड़नी शुरू कीं। गवाहों से बात की, साक्ष्यों को जोड़ा, और धीरे-धीरे तस्वीर साफ़ हुई—यह आत्महत्या नहीं, एक सुसज्जित हत्या थी, जिसे प्रताड़ना की आग में झोंककर अंजाम दिया गया था।

उधारी, विवाद और फिर मौत… शिक्षक शांतिलाल की कहानी जो दर्द बन गई, और न्याय की वो घड़ी जो मिसाल बन गई

शशांक सिंह की गहरी जांच के बाद आरोपी पति अक्षय गायकवाड के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ। कोर्ट में जब सबूतों की कड़ी सामने आई, तो जज ने एक सख्त संदेश दिया—“मंजू के सपनों की हत्या का जवाब 10 साल की सजा और जुर्माने से मिलेगा।”


बलौदाबाजार पुलिस प्रकरण 2: टिपावन की चीख़, जो कानून तक पहुँची

6 अक्टूबर की शाम। टिपावन गांव की गलियों में शांति थी, लेकिन एक घर से अचानक चीखें उठीं। अश्वनी यादव और उसकी पत्नी पर उनके ही गांव के आत्माराम यादव ने फावड़े से जानलेवा हमला कर दिया था। वजह? एक पुरानी रंजिश, जो अब खून में बदल चुकी थी।

थाना पलारी में पदस्थ सहायक उप निरीक्षक राजेश सेन ने यह मामला अपने हाथ में लिया। उन्होंने सिर्फ FIR नहीं लिखी, बल्कि इंसाफ की लड़ाई में एक सिपाही बनकर जुट गए। हर मेडिकल रिपोर्ट, हर गवाह और घटनास्थल की बारीकियां जुटाईं। आरोपी को गिरफ्तार किया और अदालत में ऐसा केस तैयार किया जिसे नकारना मुश्किल था।

नतीजा? आत्माराम को 7 साल का कठोर कारावास और 5 हजार रुपये का अर्थदंड मिला। अदालत ने माना—”यह हमला सिर्फ एक व्यक्ति पर नहीं था, बल्कि समाज की शांति पर प्रहार था।”


जब वर्दी को सलाम मिला

इन दोनों मामलों में न्याय की जो लौ जली, उसका श्रेय जाता है बलौदाबाजार पुलिस की उन पुलिस अधिकारियों को जिन्होंने ‘सरकारी ड्यूटी’ को ‘इंसाफ की सेवा’ बना दिया। आज 6 अप्रैल 2025, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक बलौदाबाजार ने निरीक्षक शशांक सिंह और सहायक उप निरीक्षक राजेश सेन को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया।

यह सिर्फ सम्मान नहीं था—यह विश्वास था उस प्रणाली में, जो जब चाहती है तो अपराधी को सलाखों तक और पीड़ित को न्याय तक पहुँचा देती है।


एक अंत… जो कई नई शुरुआतों की कहानी कहता है

बलौदाबाजार की ये दोनों घटनाएँ हमें सिखाती हैं—पुलिस की एक ईमानदार कोशिश, कानून की एक निष्पक्ष प्रक्रिया और एक मजबूत समाज—जब ये तीनों साथ आते हैं, तो न सिर्फ अपराध हारता है, बल्कि न्याय जीतता है… और यही जीत, मंजू की आत्मा और अश्वनी की जिंदगी—दोनों के लिए एक नई सुबह बन जाती है।


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