ठूंठ दे रहे गवाही, विभाग की खुली पोल
देवपुर वन परिक्षेत्र कक्ष क्रमांक 257 इस समय लकड़ी तस्करों का चारागाह बन चुका है। जंगल के भीतर दर्जनों बड़े बड़े सागौन के पेड़ों को काट दिया गया है। आज वहां पेड़ों की जगह सिर्फ ‘ठूंठ’ नजर आ रहे हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन ठूंठों पर विभाग द्वारा अब तक कोई ‘हेमरिंग’ (निशान) नहीं की गई है, जो यह साबित करता है कि या तो अधिकारियों को इस बड़ी लूट की खबर ही नहीं है, या फिर उन्होंने जानबूझकर अपनी आँखें मूंद ली हैं।
कुर्सी तक सिमटी गश्त: “फील्ड पर कौन जाए?”
नियमों के मुताबिक फॉरेस्ट गार्ड से लेकर रेंजर तक को नियमित जंगल की गश्त करनी चाहिए। लेकिन देवपुर में आलम यह है कि जिम्मेदार अधिकारी ऑफिस की सुख-सुविधाओं तक सीमित हो गए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि जब ऑफिस में बैठकर ही पगार मिल रही है, तो तपती धूप में जंगल की रक्षा करने का जोखिम कौन उठाए? बिना विभागीय मिलीभगत के इतने बड़े पैमाने पर इमारती लकड़ी का पार होना नामुमकिन लगता है।
पर्यावरण और राजस्व पर दोहरा वार
इस अवैध कटाई ने न केवल सरकार को करोड़ों रुपये के राजस्व का चूना लगाया है, बल्कि प्रकृति को भी अपूरणीय क्षति पहुँचाई है:
- आर्थिक नुकसान: सागौन की बेशकीमती लकड़ी की चोरी से शासन को लाखों-करोड़ों की चपत लगी है।
- तापमान की मार: पेड़ों की कमी से क्षेत्र का तापमान बढ़ रहा है, जिससे आम जनता गर्मी की मार झेल रही है।
- वन्यजीवों का संकट: जंगल कटने से जंगली जानवरों के प्राकृतिक आवास उजड़ रहे हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति पैदा हो रही है।
कब होगी उच्च स्तरीय जांच ?
वृक्षारोपण और सेमिनारों के नाम पर करोड़ों फूंकने वाला विभाग अपने वर्तमान वन संपदा को बचाने में पूरी तरह विफल साबित हुआ है। क्षेत्र की जनता और पर्यावरण प्रेमियों ने अब सीधे तौर पर बीट गार्ड और संबंधित अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं।
बड़ा सवाल: अगर रक्षक ही मौन रहकर भक्षक की भूमिका निभाएंगे, तो देवपुर के जंगलों को अस्तित्व खोने से कौन बचाएगा?























