बलौदाबाजार के पलारी स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर ड्यूटी के दौरान नशे में मिला। 100 गांवों के मरीज बेहाल। धरती के भगवान ने पहन ली शराब की चादर?
बलौदाबाजार/पलारी: छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार जिले के पलारी स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) की हालत इन दिनों इतनी बदतर हो चुकी है कि यह कहना गलत नहीं होगा — यह केंद्र बीमार हो गया है। मरीजों के इलाज की जगह अब यहां लापरवाही और गैर-जिम्मेदारी का इलाज हो रहा है। और सबसे गंभीर सवाल यह है — जब लोगों की जान बचाने वाले डॉक्टर ही नशे में ड्यूटी पर आने लगें, तो आम जनता क्या करे?
स्वास्थ्य केंद्र या उपेक्षा केंद्र?
पलारी का यह स्वास्थ्य केंद्र में 100 से अधिक गांवों के लिए एकमात्र प्राथमिक और आपातकालीन चिकित्सा सुविधा है। यह केंद्र कभी पूरे ज़िले के लिए स्वास्थ्य सेवा की मिसाल माना जाता था। प्रतिदिन यहां औसतन 200 से अधिक मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। लेकिन जिस सिस्टम पर ये ग्रामीण भरोसा करते हैं, वह खुद ‘भगवान भरोसे’ है। डॉक्टर समय पर ड्यूटी पर नहीं आते, और अगर आते भी हैं, तो उनकी स्थिति सवालों के घेरे में होती है।
शुक्रवार की शाम: जब डॉक्टर की असलियत सामने आई
शुक्रवार शाम की घटना में ड्यूटी पर तैनात डॉक्टर आदित्य वर्मा ओपीडी से नदारद मिले। स्टाफ ने पहले कहा कि वे पोस्टमॉर्टम के लिए गए हैं, लेकिन सच्चाई जांच में सामने आई — डॉक्टर अपने सरकारी कमरे में दरवाजा बंद कर सो रहे थे। जब पत्रकारों की टीम मौके पर पहुंची, तो डॉक्टर ने खुद को कमरे में बंद कर लिया।
मरीजों का आरोप — डॉक्टर नशे में था
OPD में इलाज के लिए घंटों इंतजार कर रहे मरीजों और उनके परिजनों ने बड़ा आरोप लगाया। उनका कहना है कि डॉक्टर नशे की हालत में था और ठीक से खड़ा भी नहीं हो पा रहा था। जब मीडिया टीम वहां पहुंची, तो डॉक्टर ने खुद को अंदर से कमरे में बंद कर लिया। यह हरकत ना सिर्फ गैर-पेशेवर है, बल्कि मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ के समान है।
एक परिजन ने कहा — हम बहुत देर से बैठे हैं साहब, लेकिन डॉक्टर साहब न तो देख रहे हैं, न सुन रहे हैं। उल्टा दरवाजा बंद कर सो गए। यह आरोप बेहद गंभीर है और डॉक्टर की मानसिक और नैतिक स्थिति पर सवाल खड़े करता है।
जब डॉक्टर ही नशे में हों, तो जिंदगी किसके भरोसे?
भारत में डॉक्टरों को ‘धरती का भगवान’ कहा जाता है, क्योंकि वे जीवन बचाते हैं। लेकिन जब वही डॉक्टर शराब के नशे में ड्यूटी करें, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति की गलती नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की नाकामी है। इस घटना ने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है — क्या अब सरकारी अस्पतालों में जिंदगी का सौदा हो रहा है?
रात की आपातकालीन सेवा पूरी तरह ठप
पलारी CHC की एक और बड़ी विफलता इसकी रात की इमरजेंसी सेवा है। जब कोई गंभीर मरीज रात में पहुंचता है, तो डॉक्टर के अभाव में पूरा जिम्मा नर्सिंग स्टाफ और जीवनदीप समिति के भरोसे छोड़ दिया जाता है। ऐसे में यदि कोई आपातकालीन केस समय पर इलाज न मिलने के कारण बिगड़ जाए, तो इसका जिम्मेदार कौन होगा?
नर्सिंग स्टाफ है, लेकिन डॉक्टर नहीं!
फार्मासिस्ट ही मरीजों को देखने लगे हैं और औषधि वितरण केंद्रों में भी कोई जवाबदेही नहीं दिखती। पूरे केंद्र की व्यवस्था मात्र एक डॉक्टर के सहारे चल रही थी — और जब यही डॉक्टर ड्यूटी पर न हो या नशे की हालत में मिले, तो मरीजों की स्थिति का अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
अब सवाल ये उठता है…
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क्या जिला प्रशासन डॉक्टर की इस गैर-जिम्मेदाराना हरकत पर कोई ठोस कार्रवाई करेगा?
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क्या ग्रामीणों को इलाज का अधिकार यूं ही कुचला जाएगा?
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क्या स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए कोई निगरानी तंत्र नहीं है?
क्या कहता है स्वास्थ्य का अधिकार अधिनियम?
भारत में स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार की मान्यता मिल चुकी है, और ऐसे में डॉक्टरों की गैर-मौजूदगी सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन है। शासन को इस मुद्दे को गंभीरता से लेना होगा और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी।
समझिए खतरे को — इलाज का मतलब सिर्फ गोली नहीं, भरोसा भी है
स्वास्थ्य सेवा एक भरोसे का नाम है। डॉक्टर सिर्फ शरीर नहीं, मनोबल भी ठीक करते हैं। जब वही डॉक्टर नशे में डगमगाते हुए मरीजों से मुंह मोड़ ले, तो मरीज को क्या बचा रह जाता है?
अब जरूरी है…
✅ डॉक्टर आदित्य वर्मा पर जांच कर तत्काल निलंबन
✅ स्वास्थ्य केंद्र में दूसरे डॉक्टरों की तैनाती सुनिश्चित करना
✅ रात में इमरजेंसी सेवा के लिए पृथक ड्यूटी शेड्यूल बनाना
✅ जनता से फीडबैक लेकर स्वास्थ्य केंद्रों की निगरानी करना
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