बलौदाबाजार कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: मां-बेटी हत्याकांड में पहली बार डबल आजीवन कारावास

बलौदाबाजार कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: मां-बेटी हत्याकांड में पहली बार डबल आजीवन कारावास
बलौदाबाजार कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: मां-बेटी हत्याकांड में पहली बार डबल आजीवन कारावास
बलौदाबाजार कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: मां-बेटी हत्याकांड में पहली बार डबल आजीवन कारावास
बलौदाबाजार कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: मां-बेटी हत्याकांड में पहली बार डबल आजीवन कारावास

मां-बेटी की निर्मम हत्या पर सख्त रुख, दोषी को उम्रकैद की दोहरी सजा.अदालत ने कहा—ऐसे अपराध समाज के लिए गंभीर खतरा.पहली बार डबल मर्डर केस में सुनाई गई दोहरी उम्रकैद, न्यायालय ने कहा—अपराध की गंभीरता के अनुरूप कठोर दंड जरूरी

बलौदा बाजार। छत्तीसगढ़ के बलौदाबाजार जिला न्यायालय से एक ऐसा फैसला सामने आया है, जिसे न्यायिक इतिहास में मील का पत्थर माना जा रहा है। मां और बेटी की निर्मम हत्या के मामले में कोर्ट ने आरोपी को दोहरी आजीवन कारावास की सजा सुनाते हुए स्पष्ट संदेश दिया है कि जघन्य अपराधों पर सख्ती से निपटा जाएगा। यह फैसला न केवल पीड़ित परिवार के लिए न्याय की एक बड़ी उम्मीद बनकर उभरा है, बल्कि पूरे समाज के लिए भी एक चेतावनी है कि रिश्तों के नाम पर किए गए अपराध अब किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे।

मामला जिसने पूरे जिले को झकझोर दिया.

यह सनसनीखेज मामला भदरा गांव का है, जहां 29 जुलाई 2024 को मां और उसकी बेटी की अधजली लाश उनके ही घर में मिलने से पूरे इलाके में हड़कंप मच गया था। मृतका संतोषी साहू और उसकी पुत्री ममता साहू की हत्या ने उस समय पूरे जिले को झकझोर दिया था। घर के भीतर जली हुई अवस्था में शव मिलने से मामला और भी रहस्यमय बन गया था। घटना के समय परिवार का एक सदस्य गांव से बाहर गया हुआ था, जिसके कारण घर में केवल मां और बेटी ही मौजूद थीं। इसी दौरान यह जघन्य वारदात अंजाम दी गई।

रिश्तों की आड़ में रचा गया खौफनाक षड्यंत्र;

जांच में सामने आया कि आरोपी दिलहरण कश्यप का मृतका संतोषी साहू के साथ अवैध संबंध था। वह अक्सर उसके घर आता-जाता था और दोनों के बीच लगातार बातचीत होती थी। मोबाइल कॉल डिटेल्स (CDR) ने इस संबंध की पुष्टि की। जांच एजेंसियों को यह भी पता चला कि घटना से पहले दोनों के बीच लंबी बातचीत हुई थी, जिससे शक और गहरा गया। धीरे-धीरे पुलिस ने पूरे घटनाक्रम को जोड़ा और आरोपी तक पहुंचने में सफलता हासिल की।

पुलिस जांच: हर सबूत ने खोला राज!

कसडोल थाना की टीम ने मामले की बारीकी से जांच की। मौके पर पहुंचकर मर्ग कायम किया गया और साक्ष्यों को इकट्ठा किया गया। जांच के दौरान आरोपी का मेमोरेंडम बयान लिया गया, जिसमें उसने कई महत्वपूर्ण खुलासे किए। उसके आधार पर पुलिस ने एक कुल्हाड़ी बरामद की, जिस पर मानव रक्त के निशान पाए गए। इसके अलावा घटना के समय पहने गए कपड़े भी जब्त किए गए, जिनमें खून के धब्बे मिले। यह सबूत अदालत में अभियोजन के पक्ष को मजबूत करने में निर्णायक साबित हुए।

25 गवाहों ने खोली सच्चाई

मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने 25 गवाह पेश किए। इनमें से 11 गवाहों ने आरोपी और मृतका के बीच संबंध होने की पुष्टि की। मेमोरेंडम के साक्षी ने भी पूरी कार्रवाई का समर्थन किया। गवाहों के बयान, मोबाइल रिकॉर्ड और जब्त साक्ष्यों ने मिलकर एक मजबूत केस तैयार किया, जिसे अदालत ने गंभीरता से लिया। हर कड़ी एक-दूसरे से जुड़ती गई और अंततः यह साबित हो गया कि हत्या पूर्व नियोजित थी।

अदालत का सख्त रुख:

इस मामले की सुनवाई जिला एवं सत्र न्यायालय बलौदाबाजार में हुई, जहां अपर सत्र न्यायाधीश राकेश कुमार वर्मा ने सभी तथ्यों और साक्ष्यों का गहन अध्ययन किया। लंबी सुनवाई और तर्क-वितर्क के बाद अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि आरोपी ने सुनियोजित तरीके से मां और बेटी की हत्या की है। अदालत ने आरोपी दिलहरण कश्यप को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 332 (क) और धारा 103 (दो बार) के तहत दोषी पाया।

दोहरी आजीवन कारावास: सख्त संदेश..

अदालत ने आरोपी को दोनों हत्याओं के लिए अलग-अलग आजीवन कारावास की सजा सुनाई। यह सजा अपने आप में विशेष है, क्योंकि जिले में पहली बार किसी डबल मर्डर केस में इस तरह का फैसला आया है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, दोहरी आजीवन कारावास का मतलब है कि आरोपी को दोनों अपराधों के लिए अलग-अलग सजा भुगतनी होगी, जिससे उसकी रिहाई की संभावनाएं बेहद सीमित हो जाती हैं। यह फैसला इस बात को भी दर्शाता है कि न्यायालय अब गंभीर अपराधों में कठोर रुख अपना रहा है।

अभियोजन की मजबूत पैरवी

मामले में शासन की ओर से अतिरिक्त शासकीय अधिवक्ता संतोष कुमार कन्नौजे ने पैरवी की। उन्होंने कोर्ट में ठोस साक्ष्य, गवाहों के बयान और तकनीकी प्रमाणों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। यही वजह रही कि अदालत को आरोपी के खिलाफ मजबूत आधार मिला और दोष सिद्ध हो सका।

अधिवक्ता संतोष कन्नौजे ने छत्तीसगढ़ टांक को बताया कि मृतिका संतोषी साहू बेवा दिलीप साहू ग्राम भदरा थाना कसडोल का ग्राम भदरा निवासी आरोपी दिलहरन कश्यप से अवैध प्रेम संबंध था। आरोपी का मृतिका संतोषी के घर आना जाना था। घटना दिनांक 28 जुलाई 2024 को मृतिका संतोषी का पुत्र ओंकार दशगात्र कार्यक्रम में दूसरे गांव गया था। दूसरे दिन 29 जुलाई 2024 को संतोषी साहू व पुत्री ममता साहू की लाश उनके घर में अधजली हालत में पाया गया। मां-बेटी की हत्या के बहुचर्चित मामले में जिला न्यायालय द्वारा सुनाए गए फैसले पर शासन की ओर से पैरवी कर रहे अतिरिक्त शासकीय अधिवक्ता संतोष कुमार कन्नौजे छत्तीसगढ़ टांक से बातचीत में कहा कि यह निर्णय पूरी तरह साक्ष्यों और ठोस विवेचना पर आधारित है। उन्होंने बताया कि प्रकरण की जांच के दौरान पुलिस ने वैज्ञानिक और तकनीकी आधारों पर साक्ष्य जुटाए। मोबाइल कॉल डिटेल (CDR) से यह स्पष्ट हुआ कि आरोपी और मृतका के बीच घटना से पूर्व लगातार बातचीत हो रही थी, जिससे दोनों के संबंधों की पुष्टि हुई। अधिवक्ता कन्नौजे के अनुसार, आरोपी के मेमोरेंडम कथन के आधार पर हत्या में प्रयुक्त कुल्हाड़ी और घटना के समय पहने गए कपड़ों की बरामदगी की गई, जिनमें मानव रक्त के चिन्ह पाए गए। यह साक्ष्य न्यायालय में अभियोजन पक्ष के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुए। उन्होंने आगे बताया कि मामले में कुल 25 गवाहों के बयान दर्ज कराए गए, जिनमें से 11 गवाहों ने आरोपी और मृतका के बीच संबंध होने की पुष्टि की। गवाहों के बयान, जब्त सामग्री और तकनीकी साक्ष्यों ने मिलकर एक सशक्त कड़ी बनाई, जिससे अपराध सिद्ध करने में मदद मिली। जिला एवं सत्र न्यायालय बलौदाबाजार के अपर सत्र न्यायाधीश राकेश कुमार वर्मा ने सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद आरोपी को दोषी पाया और दोहरे आजीवन कारावास की सजा सुनाई। अधिवक्ता कन्नौजे ने कहा कि यह फैसला न्याय व्यवस्था में विश्वास को मजबूत करने वाला है और समाज में यह स्पष्ट संदेश देता है कि गंभीर अपराधों में कानून सख्त रुख अपनाता है। उन्होंने यह भी कहा कि शासन की ओर से हर संभव प्रयास किया गया कि पीड़ित पक्ष को न्याय मिले और दोषी को कड़ी सजा दिलाई जा सके।

समाज के लिए एक बड़ा संदेश

यह फैसला केवल एक आपराधिक मामले का अंत नहीं है, बल्कि समाज के लिए एक स्पष्ट संदेश भी है। रिश्तों के नाम पर विश्वासघात और अपराध करने वालों के लिए यह चेतावनी है कि कानून की नजर से कोई नहीं बच सकता। कानूनी जानकारों का मानना है कि इस तरह के सख्त फैसले समाज में अपराधियों के मन में डर पैदा करते हैं और कानून व्यवस्था को मजबूत करते हैं।

महिलाओं की सुरक्षा पर फिर उठे सवाल

इस घटना ने एक बार फिर महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े किए हैं। घर के भीतर हुई इस वारदात ने यह दिखाया कि खतरा केवल बाहर से ही नहीं, बल्कि परिचित लोगों से भी हो सकता है। सामाजिक संगठनों का कहना है कि ऐसे मामलों में जागरूकता, सतर्कता और समय पर कार्रवाई बेहद जरूरी है।

न्याय की जीत, लेकिन दर्द बरकरार

हालांकि अदालत के फैसले से पीड़ित परिवार को न्याय मिला है, लेकिन मां और बेटी की मौत का दर्द हमेशा बना रहेगा। इस घटना ने पूरे इलाके को गहरे सदमे में डाल दिया था। आज भी लोग उस दिन को याद कर सिहर उठते हैं।

कानून का डर और न्याय का भरोसा

बलौदाबाजार में आया यह फैसला न्याय व्यवस्था की मजबूती का प्रतीक है। दोहरी आजीवन कारावास की सजा ने यह साबित कर दिया है कि कानून न केवल अपराधियों को सजा देता है, बल्कि समाज में न्याय और विश्वास को भी कायम रखता है। अब जरूरत इस बात की है कि ऐसे मामलों में जांच और सुनवाई की प्रक्रिया और तेज हो, ताकि पीड़ितों को समय पर न्याय मिल सके और अपराधियों को सख्त सजा। यह फैसला आने वाले समय में अन्य मामलों के लिए भी एक उदाहरण बनेगा और यह संदेश देता रहेगा कि अपराध चाहे जितना भी जटिल क्यों न हो, सच और न्याय की जीत निश्चित है।

 

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