बलौदाबाजार-भाटापारा में हर्बल गुलाल की धूम, ग्राम धमनी की महिलाओं ने रचा आत्मनिर्भरता का रंग‘बिहान’ से जुड़कर वंदनी स्व सहायता समूह की 11 महिलाएं बना रहीं प्राकृतिक गुलाल…पलाश, गेंदा, पालक और चुकंदर से तैयार रंगों की बाजार में भारी मांग
बलौदा बाजार। रंगों का त्योहार होली जैसे-जैसे करीब आता है, वैसे-वैसे बाजारों की रौनक बढ़ती जाती है। लेकिन इस बार बलौदाबाजार-भाटापारा जिले में होली का रंग कुछ खास है। यहां सिर्फ बाजार ही नहीं सजे हैं, बल्कि गांव की महिलाओं की मेहनत और आत्मनिर्भरता की खुशबू भी हर तरफ फैल रही है। पलारी विकासखंड के ग्राम धमनी की ‘वंदनी स्व सहायता समूह’ की 11 महिलाएं इन दिनों पूरी तरह व्यस्त हैं। वजह है हर्बल गुलाल की बढ़ती मांग। ये महिलाएं महीनों पहले से प्राकृतिक फूलों और सब्जियों से रंग तैयार करने में जुट जाती हैं। उनके हाथों से बना गुलाल अब स्थानीय बाजारों में खास पहचान बना चुका है।
फूलों से रंग तक: मेहनत की पूरी कहानी
ग्राम धमनी की महिलाएं होली से काफी पहले तैयारी शुरू कर देती हैं। सबसे पहले वे पलाश, गेंदा, पालक और चुकंदर जैसे प्राकृतिक स्रोतों को इकट्ठा करती हैं।
* *पलाश के फूलों से गुलाबी रंग
* *गेंदे के फूलों से पीला रंग
* *पालक से हरा रंग
* *चुकंदर से लाल रंग
फूलों को तोड़ने से लेकर उन्हें साफ करने, धोने, सुखाने और पीसने तक की पूरी प्रक्रिया महिलाएं अपने हाथों से करती हैं। धूप में अच्छे से सुखाने के बाद इन्हें मिक्सी में बारीक पीसा जाता है। फिर इसमें अरारोट पाउडर मिलाया जाता है ताकि गुलाल मुलायम और त्वचा के लिए सुरक्षित बने।
खुशबू के लिए गुलाब जल या सुगंधित तेल की कुछ बूंदें मिलाई जाती हैं। इसके बाद तैयार गुलाल को अलग-अलग साइज के पैकेटों में भरकर बाजार के लिए तैयार किया जाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में किसी भी प्रकार के रासायनिक पदार्थ का इस्तेमाल नहीं किया जाता। यही कारण है कि यह गुलाल त्वचा और आंखों के लिए सुरक्षित है और पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुंचाता।
तीन क्विंटल गुलाल तैयार, बाजार में भारी मांग
इस सीजन में अब तक ग्राम धमनी की महिलाएं करीब तीन क्विंटल हर्बल गुलाल तैयार कर चुकी हैं। स्थानीय बाजारों में स्टॉल लगाकर इसकी बिक्री की जा रही है। खरीदारों का रुझान साफ तौर पर प्राकृतिक और हाइजीनिक उत्पादों की ओर बढ़ा है। कई लोग खास तौर पर बच्चों के लिए यही गुलाल खरीदना पसंद कर रहे हैं। महिलाओं का कहना है कि पिछले साल की तुलना में इस बार मांग ज्यादा है। ग्राहक बार-बार आकर यही पूछते हैं कि “गांव वाली दीदियों का हर्बल गुलाल कहां मिलेगा?”
‘बिहान’ योजना से बदली तस्वीर
इन महिलाओं की सफलता के पीछे बड़ा योगदान राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन की ‘बिहान’ योजना का है। इस योजना के तहत समूह को प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और विपणन सहयोग मिला। पहले जो महिलाएं घर की चारदीवारी तक सीमित थीं, आज वे स्वयं उत्पादन, पैकेजिंग और बिक्री का काम संभाल रही हैं। समूह की सदस्य बताती हैं कि इस पहल ने उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाया है। अब वे परिवार की आय में बराबर योगदान दे रही हैं। कमाई से बच्चों की पढ़ाई, घर के खर्च और छोटी-छोटी जरूरतें आसानी से पूरी हो रही हैं।
बाजार में प्राकृतिक रंगों की बढ़ती स्वीकार्यता
होली के समय अक्सर रासायनिक रंगों से त्वचा और आंखों में जलन की शिकायतें सामने आती हैं। ऐसे में प्राकृतिक गुलाल एक सुरक्षित विकल्प बनकर उभरा है। ग्राम धमनी की महिलाओं का बनाया गुलाल पूरी तरह जैविक है। इसमें न तो कोई कृत्रिम डाई है और न ही हानिकारक केमिकल। यही वजह है कि शहर के लोग अब जागरूक होकर ऐसे उत्पादों को प्राथमिकता दे रहे हैं। स्थानीय दुकानदार भी बताते हैं कि हर्बल गुलाल की मांग लगातार बढ़ रही है। ग्राहक कीमत से ज्यादा गुणवत्ता और सुरक्षा को महत्व दे रहे हैं।
आत्मनिर्भरता की मिसाल
‘वंदनी स्व सहायता समूह’ की 11 महिलाएं आज गांव की अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि सीमित संसाधनों के बावजूद मेहनत और सही मार्गदर्शन से सफलता हासिल की जा सकती है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में चल रही योजनाओं का लाभ ग्रामीण महिलाओं तक पहुंच रहा है। समूह की सदस्य कहती हैं कि उन्हें पहली बार ऐसा लगा कि वे भी कुछ कर सकती हैं, अपना व्यवसाय खड़ा कर सकती हैं और परिवार की आर्थिक स्थिति बदल सकती हैं। उनके मुताबिक, पहले होली सिर्फ त्योहार थी, लेकिन अब यह उनके लिए आय का बड़ा जरिया भी बन गई है।
स्टॉल से पहचान तक
महिलाएं अलग-अलग बाजारों और मेलों में स्टॉल लगाकर गुलाल बेचती हैं। आकर्षक पैकिंग और “हर्बल, केमिकल फ्री” जैसे टैग लोगों का ध्यान खींचते हैं। कई ग्राहक एक बार खरीदने के बाद दोबारा लौटकर आते हैं। कुछ तो थोक में भी ऑर्डर दे रहे हैं। महिलाएं भविष्य में अपने उत्पाद की ब्रांडिंग और ऑनलाइन बिक्री की भी योजना बना रही हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इस प्राकृतिक गुलाल तक पहुंच सकें।
पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों सुरक्षित
रासायनिक रंग जहां त्वचा, आंख और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं, वहीं यह प्राकृतिक गुलाल पूरी तरह सुरक्षित है। पानी में घुलने के बाद भी यह प्रदूषण नहीं फैलाता। जानकार भी मानते हैं कि फूलों और सब्जियों से बने रंग पारंपरिक और सुरक्षित विकल्प हैं। इससे न केवल स्वास्थ्य की रक्षा होती है, बल्कि स्थानीय संसाधनों का उपयोग भी बढ़ता है।
एक पैकेट, कई मायने
ग्राम धमनी की महिलाओं के हाथों से बना यह गुलाल सिर्फ एक उत्पाद नहीं है। इसमें उनकी मेहनत, लगन और आत्मनिर्भर बनने की जिद शामिल है। जब कोई ग्राहक यह गुलाल खरीदता है, तो वह सिर्फ रंग नहीं खरीदता, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के सशक्तिकरण को समर्थन देता है।
इस होली चुनें प्राकृतिक रंग
होली खुशियों और मेल-मिलाप का त्योहार है। ऐसे में अगर रंग भी सुरक्षित और प्राकृतिक हों, तो त्योहार का आनंद दोगुना हो जाता है। बलौदाबाजार-भाटापारा जिले की ग्राम धमनी की महिलाओं ने यह साबित कर दिया है कि आत्मनिर्भरता और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं। तो इस बार जब आप होली के लिए बाजार जाएं, तो एक बार इन महिलाओं के हाथों से बने हर्बल गुलाल को जरूर अपनाएं। यह सिर्फ आपकी होली को रंगीन नहीं बनाएगा, बल्कि किसी परिवार की मुस्कान भी बढ़ाएगा। रंगों की इस खुशबू में मेहनत की महक है, आत्मसम्मान की चमक है और गांव की मिट्टी की सादगी है। यही असली होली है, जो रंगों से ज्यादा रिश्तों और उम्मीदों को रंग देती है।
रिपोर्ट: चंद्रकांत वर्मा, संपादक – ChhattisgarhTalk.com
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