



छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में सरेंडर नक्सलियों और नक्सली हिंसा से प्रभावित लोगों को प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) का लाभ मिला है। सरकार की नई नक्सल नीति के तहत पूर्व नक्सलियों को अब स्थायी आवास और सम्मानजनक जीवन मिल रहा है।
चंदु वर्मा, रायपुर: छत्तीसगढ़ की सरजमीं ने वर्षों तक नक्सली हिंसा के काले साये को झेला है, लेकिन अब उसी धरती पर उम्मीद की एक नई सुबह उग रही है। बलरामपुर जिले से आई एक खास खबर ने पूरे प्रदेश को चौंका दिया है—यहाँ आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को अब प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) का लाभ मिल रहा है। यानी जो कल तक जंगल में बंदूक के भरोसे थे, आज वे परिवार के साथ पक्के घर में जिंदगी के नए ख्वाब देख रहे हैं।
सरेंडर नक्सलियों को मिली “छत” और समाज में पहचान
सरकार की नई नक्सल नीति के तहत, अब आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को न केवल पुनर्वास सहायता दी जा रही है, बल्कि प्रधानमंत्री आवास योजना जैसे सामाजिक सुरक्षा के लाभ भी। बलरामपुर जिले में अब तक 23 सरेंडर नक्सलियों को इस योजना के तहत घर मिला है।
जिला पंचायत की मुख्य कार्यपालन अधिकारी नयनतारा सिंह तोमर ने बताया कि कुल 77 आवेदन प्राप्त हुए थे, जिनमें से 30 पात्र पाए गए। तकनीकी त्रुटियों को दूर कर शेष 7 लोगों को भी जल्द लाभ मिलेगा।
सरेंडर नक्सली “बंदूक छोड़, घर की छांव मिली” — सीताराम सोनवानी की कहानी
एक समय में नक्सली संगठन का हिस्सा रहे सीताराम सोनवानी आज अपने परिवार के साथ खुशी से प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मिले पक्के मकान में रह रहे हैं।
“1999 में नक्सली संगठन में शामिल हुआ था। पत्नी के कहने पर संगठन छोड़ दिया। 15 साल असम में रहे, फिर सरेंडर किया। जेल में भी रहे। अब सरकार ने जो छत दी है, वो हमारे लिए नई जिंदगी जैसा है।” — सीताराम सोनवानी
नक्सलवाद को बड़ा झटका, आत्मसमर्पण की बाढ़
सिर्फ बलरामपुर ही नहीं, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद पर लगातार चोट की जा रही है।
- 4 अप्रैल को 20 लाख के इनामी 4 नक्सलियों ने सरेंडर किया।
- 30 मार्च को बीजापुर में 50 नक्सलियों ने एक साथ हथियार डाले।
नक्सली हिंसा से विकास की राह पर लौटता छत्तीसगढ़
सरकार की पुनर्वास नीति अब केवल आत्मसमर्पण तक सीमित नहीं रही, बल्कि इन पूर्व नक्सलियों को अब सामाजिक पहचान, स्थायी आवास और रोजगार के अवसर भी दिए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना जैसे योजनाओं का फायदा मिलने से ये लोग समाज की मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं।
सरेंडर नक्सली सरकार की मंशा साफ — “बंदूक नहीं, घर चाहिए”
सरेंडर करने वाले नक्सलियों को जब समाज में जगह और सम्मान मिलने लगता है, तब यह केवल पुनर्वास नहीं, बल्कि शांति और विकास का स्थायी समाधान बन जाता है। बलरामपुर की यह पहल एक मिसाल है कि अगर नीति सही हो, तो लाल आतंक का अंत सिर्फ पुलिसिया कार्रवाई से नहीं, विकास और संवेदना से भी किया जा सकता है।
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