



छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले में स्थित हिंगलाज माता मंदिर, 2500 फीट ऊंची पहाड़ी पर एक रहस्यमयी गुफा में विराजमान है। जानिए इस सिद्ध पीठ तक पहुंचने की कठिन यात्रा और इससे जुड़ी आस्था की रोचक कहानी।
चैत्र नवरात्रि महाअष्टमी विशेष: छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले में, जहां एक ओर जंगलों की हरियाली फैली है, वहीं दूसरी ओर आस्था की ऐसी चोटी है, जहां पहुंचने के लिए श्रद्धालु सिर्फ अपने संकल्प और भक्ति के सहारे कठिन चढ़ाई करते हैं। 2500 फीट ऊंची पहाड़ी पर, एक अंधेरे और रहस्यमयी गुफा के भीतर माता हिंगलाज भवानी का सिद्ध पीठ स्थित है। यह वही शक्ति पीठ है, जिसे देश के 52 प्रमुख सिद्ध पीठों में शामिल किया गया है।
चैत्र नवरात्रि की महाअष्टमी पर यहां श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी हुई हैं। हर कोई इस बात से अनजान नहीं कि यहां तक पहुंचना आसान नहीं, लेकिन मां की शक्ति से भरे दर्शन के लिए हर कठिनाई छोटी पड़ जाती है।
हिंगलाज माता मंदिर: यह कोई साधारण मंदिर नहीं… यह तो शक्ति की तपोभूमि है
कवर्धा से करीब 65 किलोमीटर दूर लोहारा विकासखंड के सुतियापाट गांव में स्थित इस मंदिर तक पहुंचना किसी परीक्षा से कम नहीं। सड़क मार्ग से आधी दूरी तक गाड़ी जाती है, फिर शुरू होती है असली यात्रा – पत्थरों और पहाड़ियों से होते हुए एक संकरी और चढ़ाई वाली राह। श्रद्धालु लगभग एक घंटे की कठिन पैदल यात्रा के बाद जब गुफा के द्वार तक पहुंचते हैं, तो शरीर थका हुआ होता है पर आत्मा उत्साहित।

गुफा के अंदर करीब 50 मीटर तक माता विराजमान हैं। इसके बाद गुफा और संकरी हो जाती है। मान्यता है कि यह गुफा डोंगरगढ़ की मां बम्लेश्वरी और भोरमदेव मंदिर तक जाती है, पर अब तक कोई वहां तक नहीं गया।
कैसे मिला मां का पता – एक पुरानी किंवदंती
मंदिर के वर्तमान पुजारी केम लाल बताते हैं कि पहले इस पहाड़ के बारे में कोई नहीं जानता था। गांव के कुछ बुजुर्ग मवेशी चराते हुए जब पहाड़ी की गुफा तक पहुंचे, तो उन्हें वहां एक दिव्य ऊर्जा का अनुभव हुआ। धीरे-धीरे लोगों को पता चला कि गुफा में मां हिंगलाज भवानी विराजमान हैं। तब से ही यह स्थान सिद्ध पीठ के रूप में प्रतिष्ठित हो गया।
“मैं पिछले 30 सालों से माता की सेवा में हूं। मेरे पूर्वज भी यहीं पूजा-पाठ करते थे। अब माता के चरणों में दिन-रात सेवा ही जीवन है,” – केम लाल, पुजारी
श्रद्धा के साथ संघर्ष – हर कदम पर भक्ति की परीक्षा
चैत्र नवरात्रि के अवसर पर दुर्ग, बेमेतरा, रायपुर, बिलासपुर से श्रद्धालु यहां पहुंच रहे हैं। कई श्रद्धालु बताते हैं कि जब आधी दूरी तक गाड़ी जाती है, उसके बाद घने जंगल, पथरीला रास्ता और सीधी चढ़ाई भक्ति की परीक्षा लेती है।
“हम लोहार ब्लॉक से आए हैं। आधी दूरी गाड़ी से तय की, फिर पैदल चलकर यहां पहुंचे। कठिन है, पर मां के दर्शन मिलते ही सब भूल गए।” – एक श्रद्धालु
हिंगलाज माता मंदिर: जल, जंगल और जन – सुतियापाट का सुंदर संगम
2003 में पहाड़ी के नीचे प्रशासन ने सुतियापाट जलाशय का निर्माण कराया। अब यह पूरा क्षेत्र प्राकृतिक सुंदरता से भर गया है। जलाशय से लेकर पहाड़ और गुफा तक का दृश्य ऐसा लगता है जैसे प्रकृति ने खुद इसे आकार दिया हो।
“यहां माता हिंगलाज का मंदिर, भोलेनाथ का मंदिर और आसपास का दृश्य वाकई अद्भुत है। हर साल आते हैं। मां से शांति, परिवार में सुख और समृद्धि की कामना करते हैं।” – अंजोर दास सेन, श्रद्धालु

पर्यटन स्थल बनने की असीम संभावनाएं
यदि शासन और प्रशासन इस क्षेत्र की ओर ध्यान दे, तो यह स्थान छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थल बन सकता है। यहां बेहतर सड़क, पेयजल, ठहरने की सुविधा और प्रकाश की व्यवस्था हो तो लोग यहां अपने परिवार के साथ पर्यटन और दर्शन दोनों के लिए आएंगे।
यह एक ऐसा स्थान है जो श्रद्धा, प्रकृति और रहस्य तीनों का संगम है। यहां आना न सिर्फ एक धार्मिक अनुभव है, बल्कि आत्मिक शांति का एहसास भी है।
हिंगलाज माता मंदिर: चैत्र नवरात्रि पर विशेष आस्था
महाअष्टमी के दिन भक्त मां दुर्गा के आठवें स्वरूप की पूजा करते हैं। और जब यह पूजा माता हिंगलाज भवानी जैसे सिद्ध पीठ में होती है, तो उसका प्रभाव और आशीर्वाद कई गुना बढ़ जाता है।
श्रद्धालु कहते हैं, “जो यहां सच्चे मन से माता का आशीर्वाद लेकर जाता है, उसकी हर मुराद पूरी होती है। तभी तो लोग बार-बार यहां लौटते हैं।”
छत्तीसगढ़ टॉक की विशेष प्रस्तुति
माता हिंगलाज भवानी का यह मंदिर न सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि छत्तीसगढ़ की विरासत, प्राकृतिक सौंदर्य और आध्यात्मिकता का प्रतीक भी है। यहां की हर चट्टान, हर पेड़, हर धड़कन… मां की शक्ति का एहसास कराती है।
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