धसगुड़ जलप्रपात हादसा: 65 फीट नीचे गिरा किशोर साहू, वन विभाग लापता!

धसगुड़ जलप्रपात हादसा: 65 फीट नीचे गिरा किशोर साहू, वन विभाग लापता! (Chhattisgarh Talk)
धसगुड़ जलप्रपात हादसा: 65 फीट नीचे गिरा किशोर साहू, वन विभाग लापता! (Chhattisgarh Talk)

Baloda Bazar: छत्तीसगढ़ के धसगुड़ जलप्रपात में एक किशोर हादसे का शिकार हुआ, लेकिन सुरक्षा व्यवस्था नदारद। क्या सेल्फी की सनक ले रही है जान?

बलौदाबाजार: छत्तीसगढ़ में लगातार हो रही भारी बारिश ने जहां खेतों को हरियाली से भर दिया है, वहीं जिले के जलप्रपातों और नदी-नालों में पानी का बहाव भी चरम पर है। लेकिन इस जलधारा की खूबसूरती अब युवाओं के लिए एक नया खतरा बनती जा रही है। एक तरफ लोग जहां मानसून का लुत्फ उठाने परिवार के साथ प्राकृतिक जलप्रपातों की ओर खिंचे चले जा रहे हैं, वहीं कुछ “मनचले” युवक बारिश के इन नजारों को अपने रील और सेल्फी में कैद करने के लिए जान जोखिम में डाल रहे हैं।


धसगुड़ जलप्रपात हादसा, जो सबक बन सकता था…

गुरुवार की शाम को एक ऐसा ही दर्दनाक वाकया धसगुड़ जलप्रपात में हुआ, जब पलारी ब्लॉक के ग्राम छेरकापुर से आए तीन किशोर घूमने पहुंचे। इनमें से 15 वर्षीय निखिल साहू जलप्रपात की सबसे ऊंची चोटी पर चढ़ गया था, जहां से वह मनोरम दृश्य का आनंद ले रहा था। लेकिन प्राकृतिक सुंदरता की इस ऊँचाई पर उसकी एक चूक, भारी पड़ गई।

एक पल की मस्ती, एक पल की चूक और निखिल सीधे 60-65 फीट ऊंचाई से नीचे पत्थरों पर गिरा। उसके शरीर की चार हड्डियां टूट गईं, सिर और पीठ पर गहरे जख्म हैं — वो अस्पताल में ज़िंदगी से जंग लड़ रहा है और प्रशासन? ना वन विभाग पहुंचा, ना जिला प्रशासन का एक अदना अफसर। बस सब यही सोचते रहे – “वो तो बच गया ना, फिर क्या हंगामा?

निखिल का पैर काई जमे फिसलन भरे पत्थर पर फिसल गया और वह सीधे 60-65 फीट की ऊँचाई से नीचे पत्थरों पर जा गिरा। हादसे की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि निखिल के शरीर की चार हड्डियां टूट चुकी हैं और कई अंगों में गंभीर चोटें आई हैं। फिलहाल उसका इलाज बलौदाबाजार के एक निजी अस्पताल में चल रहा है और डॉक्टरों के मुताबिक वह अब खतरे से बाहर है, लेकिन चोटें गहरी हैं।

धसगुड़ जलप्रपात हादसा: बड़ा सवाल ये हादसा क्यों हुआ?

  • धसगुड़ जलप्रपात कोई छुपा हुआ ठिकाना नहीं है।
    बल्कि हर साल सैकड़ों लोग यहां पिकनिक, रील, फोटो, मस्ती और बारिश के मज़े लेने आते हैं।
  • लेकिन यहां ना कोई फेंसिंग है, ना कोई चेतावनी बोर्ड, ना रेस्क्यू सिस्टम और ना कोई गार्ड।
    अगर कोई गिर जाए – तो भाग्य भरोसे है।
    ये जगह जलप्रपात है या मौत का ट्रैप?

धसगुड़ जलप्रपात हादसा: रोमांच की भूख या सोशल मीडिया का दबाव?

आज के दौर में “पिक्चर परफेक्ट मोमेंट” की तलाश में युवा किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। धसगुड़ जलप्रपात जैसे प्राकृतिक स्थलों पर रील बनाना, स्टंट करना, ऊंचाई से कूदना, ये अब ट्रेंड बन गया है। लेकिन यह ट्रेंड असंवेदनशीलता और लापरवाही की हदें पार करता जा रहा है। हर साल छत्तीसगढ़ और भारत के अन्य हिस्सों में दर्जनों युवा सेल्फी लेते वक्त हादसे के शिकार होते हैं। भारत को ‘सेल्फी डेथ कैपिटल’ कहा जाने लगा है। बलौदाबाजार की ये घटना भी उसी खतरे की एक चेतावनी है।


जिला प्रशासन और वन विभाग कहाँ है?

सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि जिले के प्रमुख जलप्रपातों, खासकर धसगुड़, गिरौदपुरी घाट, रानीदाह और मेघा जैसे क्षेत्रों में ना तो कोई चेतावनी बोर्ड लगे हैं, ना सुरक्षा गार्ड तैनात हैं और ना ही बैरिकेडिंग की व्यवस्था है। जबकि ये सभी स्थल बरसात के दिनों में हजारों पर्यटकों को आकर्षित करते हैं, जिनमें सबसे बड़ी संख्या युवाओं और स्कूली बच्चों की होती है। क्या प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहा है? क्या हादसों के बाद ही बोर्ड लगेंगे, सुरक्षा जवान तैनात होंगे और नियम बनेंगे?


माता-पिता और समाज की भूमिका?

इस घटना ने एक बार फिर से माता-पिता, स्कूल और समाज को यह सोचने पर मजबूर किया है कि युवाओं को सोशल मीडिया के दिखावे से दूर कैसे रखा जाए। रोमांच के नाम पर जिंदगी से खिलवाड़ करना अब सामान्य बन गया है। युवाओं को यह समझाना जरूरी है कि एक अच्छी फोटो के लिए अपना भविष्य या जीवन दांव पर लगाना कोई समझदारी नहीं है।

कौन जिम्मेदार है इस लापरवाही का?

  • वन विभाग कहेगा – “हमने नहीं कहा था कि लोग जाएं”

  • जिला प्रशासन कहेगा – “वो तो पर्यटक स्थल ही नहीं है”

  • लोकनिर्माण विभाग कहेगा – “हम रोड तक देखते हैं, पानी में नहीं”

तो सवाल ये है:
जब सबके हाथ झाड़ने को तैयार हैं, तो निखिल गिरा कैसे? और गिरा तो अब कौन जिम्मेदारी लेगा?


क्या होनी चाहिए कार्रवाई?

  1. सभी जलप्रपातों और खतरनाक स्थानों पर चेतावनी बोर्ड लगाए जाएं।
  2. स्थानीय प्रशासन द्वारा सुरक्षा गार्ड या होमगार्ड की तैनाती की जाए।
  3. ड्रोन या सीसीटीवी से निगरानी की व्यवस्था हो।
  4. पर्यटकों के लिए गाइड और प्रतिबंधित क्षेत्र की स्पष्ट पहचान हो।
  5. स्कूलों में ‘मानसून सेफ्टी’ को लेकर सेमिनार और अवेयरनेस कैंपेन चलाए जाएं।

प्रकृति का सम्मान ज़रूरी

ध्यान देने वाली बात यह है कि प्रकृति का सौंदर्य देखने और उसमें आनंद लेने का अधिकार सभी को है, लेकिन प्रकृति का सम्मान भी उतना ही जरूरी है। जलप्रपातों में पानी का बहाव अचानक तेज हो सकता है, चट्टानें फिसलन भरी हो सकती हैं, और नीचे की गहराई जानलेवा साबित हो सकती है।


एक सबक, जो जान बचा सकता है

निखिल साहू की यह घटना एक जीवंत उदाहरण है कि एक पल की लापरवाही कैसे जिंदगी को पूरी तरह बदल सकती है। सौभाग्य से वह बच गया, लेकिन हर कोई इतना भाग्यशाली नहीं होता। प्रशासन को अब नींद से जागना होगा और युवाओं को भी समझना होगा कि सोशल मीडिया पर एक रील की कीमत उनकी जिंदगी से ज्यादा नहीं हो सकती।

“खुद को साबित करने की ज़िद में कहीं खुद को खो न देना।”


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