टोकन सिस्टम से ट्रांसफर तक: क्या बदला और क्या जस का तस? 2025 के खुलासों के बाद भी बलौदाबाजार में नहीं थमा ओवरलोडिंग का खेल, आरटीओ अधिकारी गायब, कर्मचारी संभाल रहे कमान…

टोकन सिस्टम से ट्रांसफर तक: क्या बदला और क्या जस का तस? 2025 के खुलासों के बाद भी बलौदाबाजार में नहीं थमा ओवरलोडिंग का खेल, आरटीओ अधिकारी गायब, कर्मचारी संभाल रहे कमान… (Chhattisgarh Talk)

बलौदाबाजार-भाटापारा में 2025 के टोकन सिस्टम खुलासे के बाद भी ओवरलोडिंग जारी। आरटीओ दोहरे प्रभार में, लाहौद कैंप पर सवाल, कार्रवाई के आंकड़े सार्वजनिक नहीं।

बलौदाबाजार-भाटापारा: करीब एक साल पहले 2025 में सामने आए कथित ‘टोकन सिस्टम’ ने जिले की ट्रैफिक व्यवस्था की पोल खोल दी थी। ओवरलोड ट्रकों को कथित तौर पर टोकन दिखाकर निकलने की छूट और छोटे वाहन चालकों पर सख्ती की खबरों ने पूरे प्रदेश का ध्यान खींचा था। कार्रवाई हुई, कुछ अधिकारियों को लाइन अटैच किया गया, जांच के आदेश हुए। उस वक्त लगा कि अब व्यवस्था बदलेगी। लेकिन फरवरी 2026 में हालात फिर वही सवाल उठा रहे हैं। क्या सिस्टम वाकई सुधरा, या सिर्फ चेहरे बदले? अब चर्चा का केंद्र ट्रैफिक पुलिस से हटकर परिवहन विभाग, खासकर आरटीओ कार्यालय की भूमिका पर आ गया है।


ओवरलोड ट्रक बेखौफ, छोटे वाहन चालकों पर सख्ती

बलौदाबाजार-भाटापारा जिले की सड़कों पर आज भी भारी हाइवा और ट्रक खुलेआम दौड़ते दिख जाते हैं। ग्रामीण सड़कों की हालत बद से बदतर होती जा रही है। गड्ढों से भरी सड़कें, उड़ती धूल और बढ़ते हादसे लोगों की रोजमर्रा की परेशानी बन चुके हैं।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि छोटे वाहन चालकों, खासकर बाइक वालों पर तो तुरंत चालान की कार्रवाई होती है। लेकिन ओवरलोड ट्रकों के खिलाफ बड़े स्तर पर कार्रवाई के आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए।

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सवाल यह है कि यदि जांच और सख्ती हुई थी, तो फिर ओवरलोडिंग का सिलसिला क्यों नहीं थमा?


आरटीओ का दोहरा प्रभार, जिले में “ऑटो पायलट” पर व्यवस्था?

स्थानीय सूत्रों के मुताबिक बलौदाबाजार जिले के आरटीओ अधिकारी के पास रायपुर और बलौदाबाजार दोनों जिलों का प्रभार है। ऐसे में नियमित उपस्थिति और जमीनी निगरानी पर सवाल उठना स्वाभाविक है। परिवहन व्यवस्था में ओवरलोडिंग, परमिट जांच, फिटनेस निरीक्षण और चालान जैसी प्रक्रियाएं लगातार निगरानी मांगती हैं। यदि अधिकारी का ध्यान दो जिलों में बंटा हो, तो क्या प्रभावी मॉनिटरिंग संभव है? आरोप यह भी है कि महीने में कभी-कभार ही अधिकारी की उपस्थिति दर्ज होती है और दैनिक संचालन कर्मचारियों के भरोसे चल रहा है। हालांकि विभाग की ओर से इस पर आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। सवाल उठ रहा है कि जब अधिकारी मौजूद नहीं, तो निगरानी कौन कर रहा है?


लाहौद में रोज RTO कैंप, पर कार्रवाई कहां?

फिलहाल सबसे ज्यादा चर्चा लाहौद क्षेत्र में लगने वाले परिवहन विभाग के कैंप को लेकर है। बताया जा रहा है कि यहां लगभग रोजाना RTO का कैंप लगता है। कागजों में निरीक्षण और चेकिंग दर्ज होती है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इन कैंपों में कितनी ओवरलोड गाड़ियों पर चालान हुआ? कितनी जब्ती की गई? कितने मामलों में जुर्माना वसूला गया?

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एक स्थानीय नागरिक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “अगर पूरी सख्ती हो जाए तो आधी गाड़ियां सड़क पर न दिखें।”

अब तक विभाग की ओर से विस्तृत आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। इससे संदेह और गहराता है। स्थानीय ट्रांसपोर्ट कारोबारियों के बीच यह चर्चा भी है कि कैंप औपचारिकता बनकर रह गया है।


2025 का टोकन सिस्टम: क्या सिर्फ अध्याय बंद हुआ?

पिछले साल टोकन सिस्टम के नाम पर कथित अवैध वसूली का खुलासा हुआ था। मीडिया रिपोर्ट्स के बाद कार्रवाई भी हुई। लेकिन अब जब अवैध खनन और ओवरलोडिंग की शिकायतें फिर तेज हैं, तो सवाल उठ रहा है कि क्या सिस्टम वाकई बदला? यदि अवैध परिवहन पर सख्ती होती, तो सड़कों पर खुलेआम ओवरलोड हाइवा और ट्रक कैसे दौड़ रहे हैं? यदि जांच हुई, तो उसका परिणाम सार्वजनिक क्यों नहीं?

बड़े सवाल फिर सामने

  • जब अधिकारी दो जिलों का प्रभार संभाल रहे हैं, तो जमीनी निगरानी कौन कर रहा है?

  • लाहौद कैंप में कितनी गाड़ियों पर चालान हुआ, कितनी जब्ती हुई, इसका रिकॉर्ड सार्वजनिक क्यों नहीं?

  • अगर सब कुछ नियमों के तहत है, तो पारदर्शिता से आंकड़े जारी करने में हिचक क्यों?

सड़कें टूटीं, जवाबदेही भी?

ओवरलोड वाहनों से जिले की सड़कों की हालत जर्जर हो रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में धूल, गड्ढे और हादसों का खतरा बढ़ा है। आम लोगों का कहना है कि छोटे वाहन चालकों पर चालान आसान है, लेकिन बड़े नेटवर्क पर कार्रवाई मुश्किल। यह भी चर्चा है कि कुछ कर्मचारी “मैदान” संभाल रहे हैं और ऊपर तक सेटिंग की फुसफुसाहट है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।


अवैध खनन और परिवहन: पुराना कनेक्शन

बलौदाबाजार-भाटापारा क्षेत्र लंबे समय से रेत और अन्य खनिजों के परिवहन को लेकर सुर्खियों में रहा है। अवैध खनन की शिकायतें पहले भी उठती रही हैं। ओवरलोड ट्रकों का सीधा संबंध खनन और निर्माण कारोबार से जुड़ा होता है। यदि परिवहन विभाग की निगरानी ढीली पड़े, तो अवैध खनन को अप्रत्यक्ष संरक्षण मिल सकता है। ग्रामीणों का कहना है कि रात के समय भारी वाहन ज्यादा सक्रिय रहते हैं। इससे दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ता है और सड़कें जल्दी खराब हो जाती हैं।


सड़कें टूटीं, जवाबदेही कौन लेगा?

ओवरलोड वाहनों का सबसे बड़ा असर सड़कों पर दिखता है। करोड़ों रुपये की लागत से बनी ग्रामीण और जिला सड़कें कुछ ही महीनों में उखड़ने लगती हैं। जब सड़कें खराब होती हैं, तो जिम्मेदारी लोक निर्माण विभाग पर आती है। लेकिन यदि ओवरलोडिंग पर नियंत्रण नहीं होगा, तो सड़कें बार-बार टूटती रहेंगी। ऐसे में सवाल यह है कि क्या विभिन्न विभागों के बीच संयुक्त अभियान चलाया गया? क्या पुलिस, खनन और परिवहन विभाग ने मिलकर कोई समन्वित कार्रवाई की?


कर्मचारी संभाल रहे कमान?

चर्चा यह भी है कि अधिकारी की सीमित उपस्थिति में कर्मचारी ही मैदान संभाल रहे हैं। आरोपों की फुसफुसाहट यहां तक जाती है कि कुछ स्तरों पर “मैनेजमेंट” की व्यवस्था चल रही है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन लगातार उठते सवाल इस बात की ओर इशारा करते हैं कि पारदर्शिता की कमी भरोसे को कमजोर कर रही है। यदि सब कुछ नियमों के तहत हो रहा है, तो विभाग विस्तृत कार्रवाई रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं करता?

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दो जिलों का प्रभार: व्यावहारिक या जोखिम?

प्रशासनिक दृष्टि से दो जिलों का प्रभार एक अधिकारी को देना असामान्य नहीं है। लेकिन परिवहन जैसे संवेदनशील विभाग में जमीनी उपस्थिति बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। हर दिन सैकड़ों वाहनों की जांच, फिटनेस, परमिट और चालान से जुड़ी कार्रवाई होती है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या दो जिलों की जिम्मेदारी एक साथ निभाना व्यावहारिक है?


जनता के मन में उठते सवाल

  • लाहौद कैंप में अब तक कितनी ओवरलोड गाड़ियों पर वास्तविक कार्रवाई हुई?
  • पिछले छह महीनों में कितनी गाड़ियों को जब्त किया गया?
  • ओवरलोडिंग से सड़कों को हुए नुकसान का आकलन किया गया या नहीं?
  • क्या 2025 के बाद निगरानी तंत्र में कोई ठोस सुधार हुआ?

जब तक इन सवालों का स्पष्ट जवाब नहीं मिलता, संदेह बना रहेगा।


प्रशासन की अग्निपरीक्षा

फरवरी 2026 में उठे ये सवाल प्रशासन के लिए एक अग्निपरीक्षा की तरह हैं। 2025 के बाद यदि व्यवस्था सचमुच सुधरी है, तो इसे तथ्यों के साथ सामने लाना जरूरी है। यदि कमियां हैं, तो उन्हें स्वीकार कर सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाना ही बेहतर विकल्प है।


क्या बदलेगा या फिर वही कहानी?

बलौदाबाजार-भाटापारा जिले में ओवरलोडिंग, अवैध परिवहन और कथित टोकन सिस्टम की गूंज अभी पूरी तरह थमी नहीं है।

एक साल बाद भी वही सवाल उठ रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार नजर ट्रैफिक पुलिस से हटकर परिवहन विभाग पर है।

जिले की जनता अब केवल आश्वासन नहीं, आंकड़ों और कार्रवाई की पारदर्शी तस्वीर देखना चाहती है।

क्या विभाग विस्तृत रिपोर्ट जारी करेगा?
क्या संयुक्त अभियान चलेंगे?
क्या दो जिलों का प्रभार पुनर्विचार में आएगा?

आने वाले दिनों में इन सवालों के जवाब तय करेंगे कि 2025 का खुलासा एक मोड़ था या सिर्फ एक अध्याय।

रिपोर्ट: चंद्रकांत वर्मा, संपादक – ChhattisgarhTalk.com

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